टैग पुरालेख: कविता

तुम्हारे इन्तजार में


सब कूछ वैसा ही हैं जब से तुम गये हो.

सब कूछ. बस तुम नही हो.

फूलों में मुस्कुराहट .

किताब पे दस्तखत.

तुम्हारी चुडीया.

आईने पे चिपका लाल टीका.

कॉफी मग पे लिपस्टिक के निशान.

सब कूछ.

मैने वैसे ही सम्हाल के रखा हैं ये सब.

मानो मेरा अस्तित्व निर्भर करता हो

उन्हें इस तरह सम्हालने पर.

या तुम ऐसे ही देखना चाहोगे उन्हें वापसी के बाद?

देखो ना.

अधखुली खिडकी भी कर रही हैं तुम्हारा इंतेजार.

 

 

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